ना राहि,ना राह,ना मंजिल ना उसकि चाह मै अकेला हुँ अकेला हि रेहना पसंद करता हुँ मै सुरज हुआ तो दिन में हि निकलना पसंद करता हुँ मै रात के अंधेरे में अकेला चाँद होना पसंद करता हुँ बात एसि नहि कि तुम मुझे बुरा समझते हो, अच्छा है तुम वो समझते हो, मै बुरा समझा जाऊँ,मै वहि पसंद करता हुँ बहोत बार सुना है मै समझता नहि कुछ, तुम मुझे नासमझ समझो सच बताता हुँ,मै नासमझ समझ जाना हि पसंद करता हुँ :-@bhi
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हालातों से हारकर जमिन पर गिर गया मै माँगता रहा मदत हर एक से हर शख्स पिठ दिखाता गया कुछ लोग दे गए भरोसा हात जरुर देंगे मै नादान भरोसा करता गया बोलते गए अपने 'यही पास हि है मंजिल' मै बरसौ कहि गयि राह पे चलता गया बेहकाते गए मुझे खुदसे मै बेहकावे को सच मानता गया सब लोग बताते रहे "जाना कहाँ है" "कैसे?" पुछने पर चेहरा मुकरता गया मै नादान भरोसा करता गया :-@bhi