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Showing posts from October, 2018
वो रातभर जागता जिंदगि मे करना क्या है यही सोचता पलके मिटति पलके खुलति मिटने पर भि सवाल था,खुलने पर भि सवाल था थी लाखो मंजिले उन तक पोहचने का रस्ता ही धुंडला था चेहरे की हसी मन मे डबी थी मन की ख्वाहीश जिम्मेदारीयों मे डबी थी ये जुबान बोलना कुछ और चाहति थी ये जुबान बोल कुछ और रही थी पंख तो है उडने की ताकद ना रही सिर्फ पंख फडफड़ाने से ये मंजिल मिलने से ना रही

मै झुकता नही मै झुकाता हुँ

मै झुकता नही मै झुकाता हुँ मै मानता नही मै मनाता हुँ मै रुकता हुँ मै चलता हुँ मै चलता हुँ मै दौडता हुँ मै गिरता हुँ मै संभलता हुँ, मै रोता हुँ मै हसता हुँ मै बोलता हुँ मै गाता हुँ मै पाता हुँ मै खोता हुँ मै मिलता हुँ मै बिछडता हुँ कोई आता है कोई जाता है मै देखता हुँ मै सुनता हुँ मै समझता हुँ मै समझाता हुँ
ना हैं सपने ना है अपने अंधेरे ही आँखो के सामने चलता जाता थोडा रुकता हर घडी हर मोड मै गिरता मै संभलता आस नही है कोई पास नही है जिने का मुझमे कोई एहसास नही है

रास्ता है तो मंजिल होंगी

रास्ता है तो मंजिल होंगी पथ्थर है तो ठोकर होंगी धुवा है तो आग भि होंगी जिंदगी है तो मौत भि होंगी झुठ है तो सच्चाई भि होंगी हर सिक्के की दुसरी बाजु होंगी चालु है तो खतम भि होंगा आरंभ है तो अंत भि होंगा है असर वो बेअसर भि होंगा जिसका मान है वो बदनाम भि होंगा वक्त है बदलना होंगा जी रहा है तुझे मरणा भि होगा
क्या जिया तु जब जिते जी कभि मरा ही नही ये कैसा घमंड है तेरी जित का जैसे कभि हरा ही नही एसे हस रहा है जेसै कभि रोया ही नही
क्या हैसियत की बात करता है  यहा सुरज भि शाम को डुबता है घर मे बैठ के क्या शेर बनता है दुनिया मे पैर रख यहाँ हर गुरुर टुटता है यहाँ परछाई का अंधेरो मे साथ छुटता है और तु इंसानो की बात करता है ये ज़माना सिर्फ पैसो की भाषा समझता है इस दुनिया मे हर शिकारी तेरे जैसा शिकार धुँडता है इस दुनिया मे हर रिश्ता बिकता है