वो रातभर जागता
जिंदगि मे करना क्या है यही सोचता

पलके मिटति पलके खुलति
मिटने पर भि सवाल था,खुलने पर भि सवाल था
थी लाखो मंजिले उन तक पोहचने का रस्ता ही धुंडला था

चेहरे की हसी मन मे डबी थी मन की ख्वाहीश जिम्मेदारीयों मे डबी थी
ये जुबान बोलना कुछ और चाहति थी
ये जुबान बोल कुछ और रही थी

पंख तो है उडने की ताकद ना रही
सिर्फ पंख फडफड़ाने से ये मंजिल मिलने से ना रही


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