,वो इन्सान है खुदमे ही मरता है

वो चलता है,वो रूकता है
वो देखता है,वो सुनता भी है
वो इन्सान है बस यही भुलता है
वो इन्सानियत की उम्मिद रखता है,खुदमे इन्सानियत नही जगाता
वो खुद उठणे के लिए हात माँगता है,कीसी गिरे हुए को हात नही देता
वो इन्सान है बस यही भुलता है
वो भुतकाळ मे जिता है,वो भविष्य की चिंता करता है
वो इन्सान है वर्तमान को अनदेखा करता है
वो चार दिवारियों के कल मे बैठता है,वो छत मे कल को देखता है,वो इन्सान है खुदमे ही मरता है

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