मै शुन्य से सौ बन बैठा हुँ

पश्चाताप कि आग में जल बैठा हुँ
तन्हाईयों कि आँखो में उलझ बैठा हुँ
शायद मै जिंदगि को समझ बैठा हूँ
मै राजों को राज रखके नासमझ बन बैठा हुँ
मै जिंदगि का सार कम उम्र में बता बैठा हुँ
मै शुन्य से सौ बन बैठा हुँ

कुछ अधुरी कहानियों को दिल में डबा बैठा हुँ
बहोत से बिते पलों को स्याहि से कागज पे उतार बैठा हुँ

अब आग से फरक नहि पडता,
मै राख से हजारों बार जन्म ले बैठा हुँ
अब डुबने से भय नहि लगता,
जो अब मै समंदर पि बैठा हुँ
तलवारों के घाव नहि होते मुझमे
तलवारों कि धार बन बैठा हुँ
दुश्मनों के तिरों को राह दिखाने वालि कमान बन बैठा हुँ

जो अब सारथ्य करने के लिए श्रीकृष्ण आ गये है
मै महाभारत खत्म करने वाला अर्जुन बन बैठा हुँ

सालों से अंजानि राह पे चल रहा हुँ
मै अंजानि राहों का अनुभवि मुसाफिर बन बैठा हुँ
मै शुन्य से सौ बन बैठा हुँ
मै शुन्य से सौ बन बैठा हुँ


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