hindi poem lost own words

मै अपनि मर्जि से नहि गिरा था दलदल में
मै अपनि मर्जि से धसता रहा इस दलदल में
मै चुप रहा मुझे बचाने आयि राहों की आवाजों में

मैने लढाई छोड दि बिच लढाई में
मैने सांस छोड दि जानतेहुए भि
की जान थोडि बाकि है मेरी जान जाने में

फस गया हुँ दुनिया के झमेलों में
खो गया हुँ अंजानो के मेलों में
हात छुट गया है खुदका खुदसे इस भिड में
परेशान हो गया हुँ खुदको धुँडते धुँडते इन गर्दिशो में
चिध गया था खुदा सें चलाता है दुनिया को तो बता धुँदु मै कहा खुदको गर डौर है मेरी ये तेरे हात में
जल गया हुँ सुरज में या डुब गया हुँ पाणि में
शेहंशाह है नशिबो का तो बता
चल पडा हुँ कहि दुर या छुट गया हुँ परछाईयों सा अंधेरो में
हार गया हुँ मै ए परवरदिगार बता मुझे,क्या धुँद पाऊँगा मै खुदको खुदसे
खुदा ने दि मंजुरी कहाँ अरे कब का निकल चुका है तु तुझसे
गर पाना हि है फिरसे तो ले बता देता हुँ कहा मिलेंगा तु खुदसे
देख ले एकबार अपनि माँ कि आँखो में
मिल जाऐंग़ा खुदसे माँ कि दुवाओं में
:-@bhi

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