"अब हम सुधर रहे है"

बहोतों कें नकाब अब उतर रहे है
जो अब हम सुधर रहे है

बुरी आदतों पें झुठमुठ का गुस्सा लाजमि था
मेरी अच्छि आदतों पे अब जल रहे है
बहोतों कें नकाब उतर रहे है

उनकी सच्चाई आयने में दिखाई तो
मेरी सच्चाई पे सवाल उठ रहे है
आँखो की धुल खुदसे झटकी तब देखा
धुल फेकने वाले गुस्सा हो रहे है

मेरे खिलाफ ही
तुफानों के मेले लग रहे है
नकाब पेहनने वाले एक साथ दिख रहे है

मुझे बार बार गिरा रहे है
मै हर बार गिरने के बाद उठ रहां हुँ
इस बात पे खफा हो रहे है

वो बेइज्जती करें, मै फिर भि हस रहा हुँ
इस बात से वो चिध रहे है

किसिने पुछा इतनि उंगलिया उठ रही है
फिर भि आप जवाब क्युँ नही दे रहे है
जवाब में मैने ये केह दिया
"अब हम सुधर रहे है"



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