कुछ पल है उन्हे भुलना चाहता हुँ
कुछ पहेलियाँ है सुलझाना चाहता हुँ
कुछ मंजिलों को मिलने से पहले राहों में भटकना चाहता हुँ
कुछ आवाजे है सुनना चाहता हुँ
कुछ शब्द है बोलना चाहता हुँ
कुछ रुठों को फिरसे अपनाना चाहता हुँ
कुछ पन्ने  है किताब के फिर से लिखना चाहता हुँ
कुछ रुसवे है तकदिर के उन्हे बदलना चाहता हुँ
कुछ नाराज है उन्हे समझना चाहता हुँ
कुछ काँटे चुभे है राहो में निकालना चाहता हुँ
बहोत चल लिया अब थोडा रुकना चाहता हुँ

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